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ऑनलाइन पैसे गए? तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें चेक बाउंस हुआ? रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के अंदर डिमांड नोटिस भेजना ज़रूरी है किसी को भी OTP, UPI PIN या स्क्रीन-शेयरिंग की पहुँच न दें पुलिस का नोटिस आया है? उसकी कॉपी रखें और जवाब देने से पहले कानूनी सलाह लें चैंबर: 3RD FLOOR KRISHNA MANSION CIVIL LINES GURUGRAM
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मुफ़्त टूल · धारा 138 NI एक्ट

चेक बाउंस डेडलाइन कैलकुलेटर

अपने चेक, बैंक के रिटर्न मेमो और डिमांड नोटिस की तारीख़ें डालें। कैलकुलेटर क़ानून द्वारा तय हर क़दम की आख़िरी तारीख़ और बचे हुए दिन दिखाता है।

चेक
बैंक का रिटर्न मेमो
डिमांड नोटिस

तारीख़ें कैसे गिनी जाती हैं

  1. चेक की वैधता। चेक उस पर लिखी तारीख़ से तीन महीने के अंदर बैंक में लगाना होता है, 1 अप्रैल 2012 से लागू RBI निर्देशों के अनुसार।
  2. डिमांड नोटिस। बैंक से चेक बाउंस की सूचना मिलने के 30 दिन के अंदर लिखित में भेजना ज़रूरी है (धारा 138(b))।
  3. भुगतान का समय। नोटिस मिलने के बाद चेक देने वाले को 15 दिन मिलते हैं (धारा 138(c))। अपराध तभी पूरा होता है जब इन 15 दिनों में भुगतान न हो।
  4. शिकायत। वाद-कारण बनने के दिन से, यानी 15 दिन ख़त्म होने के अगले दिन से, एक महीने के अंदर दायर करनी होती है (धारा 142(1)(b))।

ध्यान रखने वाली बातें

  • गिनती में पहला दिन छोड़ दिया जाता है (धारा 9, साधारण खंड अधिनियम, 1897)। "एक महीना" का मतलब कैलेंडर महीना है: Saketh India Ltd. v. India Securities Ltd., (1999) 3 SCC 1, और Econ Antri Ltd. v. Rom Industries Ltd., (2014) 11 SCC 769।
  • 15 दिन ख़त्म होने से पहले दायर शिकायत समय से पहले (प्रीमैच्योर) होती है: Yogendra Pratap Singh v. Savitri Pandey, (2014) 10 SCC 713।
  • अगर शिकायत देर से है, तो देरी का पर्याप्त कारण दिखाने पर कोर्ट उसे फिर भी सुन सकता है (धारा 142(1)(b) का परंतुक)।
  • अगर नोटिस "इनकार" (refused) या "दावा नहीं किया" (unclaimed) लिखकर लौटा, तब भी नोटिस मिलना माना जा सकता है। ऐसे में किस तारीख़ से गिनें, यह तथ्यों पर निर्भर करता है, इसलिए सलाह लें।
  • अगर आख़िरी तारीख़ रविवार या कोर्ट की छुट्टी पर पड़े, तो कोर्ट का कैलेंडर देखें। आख़िरी तारीख़ से पहले कार्रवाई करना सबसे सुरक्षित है।

चेक बाउंस पर और जानकारी

यह कैलकुलेटर आपकी डाली गई तारीख़ों के आधार पर सामान्य जानकारी देता है। यह क़ानूनी सलाह नहीं है। समय-सीमा ऐसे तथ्यों पर भी निर्भर कर सकती है जिन्हें कैलकुलेटर नहीं देख सकता, इसलिए कोई क़दम उठाने से पहले अपनी तारीख़ें किसी अधिवक्ता से पक्की कर लें।

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